उत्तराखंड में एक बेहद अजीब वाक्या सामने आया है। यहां गंगोत्री हिमालय की सतोपंथ चोटी पर गए भारतीय सेना के जवानों के एक दल को कुछ ऐसा दिखा है कि उनके होश उड़ गए।


16 सालों तक बर्फ में दबा रहा सेना के जवान का शव anish tyagi storyस्वर्णिम विजय वर्ष के उपलक्ष्य में गंगोत्री हिमालय की सबसे ऊंची चोटी सतोपंथ के आरोहण के लिए निकले भारतीय सेना के जवानों को अपने ट्रैक के दौरान कुछ ऐसा दिखा जिसने उनके होश उड़ा दिए हैं।

दरअसल हाल ही में भारतीय सेना का एक दल स्वर्णिम विजय वर्ष के उपलक्ष्य में गंगोत्री हिमालय की सबसे ऊंची चोटी सतोपंथ (7075 मीटर) के आरोहण के लिए गया था। अभियान के दौरान सेना के जवानों को बर्फ में एक शव दबा हुआ दिखा। सेना के जवान पहले तो कुछ समझ नहीं पाए। इसके बाद सेना के जवान उस शव के पास पहुंचे और तहकीकात शुरु की। इसके बाद जो सच्चाई सामने आई उसे सुन वो हैरान रह गए।

2005 में हुए थे लापता

दरअसल सेना के जवानों को बर्फ में जो शव मिला वो भारतीय सेना के ही एक जवान का था। पता चला कि 2005 में भारतीय सेना के जवानों का एक दल सतोपंथ पर तिरंगा फहराने निकला था। इसी दौरान एवलांच होने की वजह से सेना का एक नायक अनीश त्यागी पुत्र राजकुमार निवासी मोदीनगर गाजियाबाद उत्तरप्रदेश दल से बिछड़ गया और हादसे का शिकार हो गया। दल के जवानों ने उसे तलाश करने की कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली।

साल 2021 में सितंबर 22 तारीख को सेना के जवानों का एक दल फिर एक बार ठीक उसी स्थान से सतोपंथ के लिए निकला। 16 सालों बाद उन्हें एवलांच में खोए जवान के अवशेष बर्फ में दबे मिले।


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इसके बाद जवानों ने मृत जवान के सामान और वर्दी वगैरह की तलाशी ली। तब उन्हे पता चला कि ये 16 साल पहले लापता हुए जवान का शव है। इसके बाद स्थानीय अधिकारियों को सूचना दी गई। जवानों ने मृतक के अवशेषों को एकत्र कर गंगोत्री पुलिस को सौंपा।

दिया गया सैन्य सम्मान

16 साल बाद मिले जवान के शव को पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनके पैतृक गांव भेजा गया। इसके पूर्व डीएम ने जवान के पार्थिव शरीर को सलामी दी। अधिकारियों ने पुष्प चक्र अर्पित किए।

पुलिस ने सेना की ओर से सौंपे गए जवान के पार्थिव शरीर का पंचनामा भरकर पोस्टमॉर्टम भी कराया। पुलिस ने सेना की आशंका पर जवान के पार्थिव शरीर के डीएनए टेस्ट के लिए उसके डीएनए का सैंपल भी लिया है।

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सैन्य सूत्रों ने बताया कि वर्ष 2005 की घटना की परिस्थितियों व जिस स्थान पर शव मिला उसकी परिस्थितियों के मिलान के आधार पर उसकी पहचान की गई है। जिस स्थान पर घटना घटी थी, ठीक उसी स्थान पर उसी स्थिति में शव बरामद हुआ है। वर्ष 2005 के दल के सदस्यों से भी इसे लेकर बातचीत की गई है।

अमर उजाला की एक खबर के अनुसार 23 सितंबर को अनीश त्यागी अपने दल के साथ सतोपंथ पर तिरंगा फहरा कर लौट रहे थे। इसी दौरान एवलांच आ गया और चार जवान खाई में गिर गए। इनमें से तीन का शव तो बरामद हो गया था लेकिन अनीश का शव नहीं मिला था। लगभग 16 साल बाद अनीश का शव उसी स्थान पर मिला।

पहले भी मिले हैं शव

हिमालय को न जानने वालों के लिए सोलह साल बाद शव मिलने की घटना भले ही विस्मयकारी लेकिन हिमालय को जानने वालों के लिए यह कोई अनोखी बात नहीं है। इससे पहले भी कई बार सालों पुराने शव बरामद होते रहे हैं। हिमाचल और उत्तराखंड की बर्फीली पहाड़ियों में अभी तक कि जानकारी के अनुसार 45 साल पुरानी लाश तक दबी मिली है।

दरअसल हिमालय पर होने वाले हादसों के दौरान जो कि बर्फ पर से पैर फिसलने के दौरान गहरी खाई में गिरने या किसी तूफान के आने पर बर्फीली चट्टानों में दबने जैसे होते हैं, लोगों की लाश पानी और हवा की पहुंच से दूर होने के साथ-साथ ही कई-कई फुट नीचे माइनस टेम्प्रेचर में दबी ये लाशें सालों तक सुरक्षित रहती हैं। ग्लोबल वार्मिंग के असर से जैसे ही बर्फ एक सीमा से अधिक पिघलनी शुरू होती है, वैसे ही ये शव दिखने लगते हैं।

हिमालय में होने वाले ऐसे हादसों की बात करें तो 7 फरवरी 1968 को हुआ यह हादसा बरबस ही याद आता है। जब भारतीय वायुसेना का एन-12 विमान 98 जवानों को चंडीगढ़ से लेकर लद्दाख जा रहा था। हिमाचल की चंद्रप्रभा पर्वत श्रृंखला के पास मौसम खराब होने के कारण यह विमान क्रैश हो गया था। इस हादसे के बाद जहाज के सारे जवान लापता हो गए थे।

15 साल बाद 16 अगस्त 2013 को हवलदार जगमाल सिंह निवासी गांव मीरपुर, रेवाड़ी (हरियाणा) का शव हिमाचल प्रदेश के चंद्रभागा क्षेत्र में बर्फ में दबा हुआ मिला था। शव के दाएं हाथ पर बंधी सिल्वर डिश पर आर्मी नंबर से उनकी पहचान हुई थी। जिस पर 45 साल बाद 4 सितंबर 2013 को मीरपुर गांव में शहीद जगमाल सिंह का अंतिम संस्कार हुआ था।

वहीं यूपी के मैनपुरी जिले के कुरदैया गांव निवासी गयाप्रसाद 15 राजपूत बटालियन में हवलदार के पद पर तैनात थे। 1996 में वे अपने साथियों संग सियाचिन में ड्यूटी कर रहे थे। अचानक वे बर्फीली खाई में गिर गए। उन्हें खोजने के लिए चलाए गए तमाम ऑपरेशन भी बेनतीजा साबित हुए थे।

इस घटना के भी अट्ठारह साल के बाद अगस्त 2014 में एक खोजी दल को उनकी लाश उत्तरी ग्लेशियर के खंडा और डोलमा पोस्ट के बीच बर्फ में दबी मिली। जबकि इस हादसे के बाद 1999 में सेना द्वारा गफलत के चलते गयाप्रसाद के परिजनों को एक पत्र भेजकर उनके पाकिस्तानी सेना के खिलाफ चलाए गए ‘आपरेशन मेघदूत’ में शहीद होने की जानकारी दी थी।

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