1980 से देश हॉकी में पदक की बाट जोह रहा था जिसका सूखा टोक्यो ओलंपिक में खत्म हुआ और भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने देश को एक बहुत बड़ा तोहफा देते हुए जर्मनी से मैच जीत कर कांस्य पदक अपने नाम किया । कहने को भले ही यह कांस्य पदक है लेकिन इसकी कीमत गोल्ड पदक से कहीं कम नहीं है 135 करोड़ देशवासियों में सुबह से ही खुशी की लहर है एक तरफ जहां हॉकी टीम के कोच का कहना है कि उनकी 2 साल की कड़ी मेहनत रंग लाई है तो वहीं दूसरी ओर उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का योगदान इस सपने को साकार करने में सबसे अहम साबित हुआ है।

भारतीय हॉकी टीम की प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक तरफ जहां कोच ने पूरी टीम की मेहनत को बताया है वही टीम के कप्तान ने कहा है कि यह पूरी टीम की जीत है और देश के लिए गौरव का पल भी।टीम इंडिया ने ब्रॉन्ज मेडल मैच में जर्मनी को 5-4 से हरा दिया। पूरे देश ही नहीं दुनियाभर में भारतीय हॉकी टीम की चर्चा 1980 के बाद, यानी 4 दशक बाद एक बार फिर हुई है। टीम की मेहनत तो मायने रखती ही है, लेकिन टीम को न केवल स्पॉन्सर करने बल्कि उसे खेल के मैदान, खेल के उपकरण से लेकर अभ्यास तक की सभी सुविधाएं मुहैया करवाने वाले राज्य ओडिशा का जिक्र भी आज सबकी जुबान पर है।

आपको बता दें कि हॉकी टीम की स्पॉन्सरशिप की रकम 150 करोड़ रुपए थी। मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने साफ कहा था, स्पॉन्सरशिप लेने का मतलब सिर्फ चेक फाड़कर देना नहीं होता। खिलाड़ी बनाने के लिए अपना वक्त देना पड़ता है। और उन्होंने वही किया।

हॉकी इंडिया के मुखिया नरेंदर बत्रा के साथ लगातार संपर्क में रहने और अपडेट लेने के साथ उनकी अड़चनों और मुश्किलों को भी दूर करने का जिम्मा उड़ीसा सरकार का था। अभ्यास के लिए खिलाड़ियों को हॉकी का स्टेडियम मुहैया करवाना। उस दौरान सभी खर्चों को उठाना। यह जिम्मेदारी उड़ीसा सरकार ने बखूबी निभाई स्पॉन्सरशिप के खर्चे के अलावा खिलाड़ियों पर होने वाले खर्च जैसे कि रहन-सहन डाइट प्लान आदि के ऊपर भी उड़ीसा सरकार ने खोलकर खर्च किया और टेक्निकल तौर पर टीम को पूरी तरह से सुंदर बनाया जिसका नतीजा आज सबके सामने है और पूरा देश उस नतीजे को ब्रोंज मेडल के रूप में देख रहा है।