Uttarakhand: उत्तराखंड में सरकारें भले ही जीरो टालरेंस की बात करती रहीं हों लेकिन सच यही है कि गुपचुप तरीके से सबके काम हो रहें हैं हां लेकिन ढींढोरा जीरो टालरेंस का ही पीटा जा रहा है।


uttarakhand open university

ताजा वाक्या उत्तराखंड ओपन यूनिवर्सिटी (Uttarakhand Open University) का सामने आया है। अमर उजाला में प्रकाशित एक खबर के अनुसार ओपन यूनिवर्सिटी में 56 लोगों की नियुक्तियां बिना शासनादेश के कर दी गईं हैं। यानी ये ओपन यूनिवर्सिटी में छुपते छुपते अपनों को ‘सेट’ करने का सीधा मामला है।

 

अखबार लिखता है कि, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में बिना पद और आदेश के 56 लोगों की नियुक्ति का मामला सामने आया है। ऑडिट में इसका खुलासा हुआ है और उच्च शिक्षा सचिव को वित्त सचिव ने आवश्यक कार्रवाई के लिए पत्र भी लिख दिया है। हालांकि पत्र लिखने के एक साल बाद भी इसपर कोई कार्रवाई नहीं की गई है। खबर के अनुसार नेताओं व अफसरों के चहेतों की नियुक्ति से जुड़ा होने की वजह से सभी ने चुप्पी साध रखी है।

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दिलचस्प तथ्य ये भी है कि यदि पद स्वीकृत भी हैं तो भी शासन के आदेश के बिना कोई नियुक्ति नहीं की जा सकती है। फिर ये नियम लगभग सभी तरह की नियुक्तियों पर लागू होता है। चाहें वो संविदा हों, दैनिक वेतन वाले हों, नीयत वेतन, अंशकालिक या तदर्थ नियुक्तियां हों।

हर महीने लाखों की सेलरी 

अखबार के अनुसार जिस ऑडिट रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है वही ऑडिट रिपोर्ट बताती है कि प्रति माह लगभग 44 लाख रुपए इन पदों पर नियुक्ति लोगों के वेतन में खर्च किए जा रहें हैं। इसमें 30 तकनीकी, प्रशासनिक, अकादमिक एवं परामर्शदाताओं की भर्ती की गई। अखबार बताता है कि विश्वविद्यालय में वर्ष 2017-18  व 2018-19 में बिना पद-सृजन के आउटसोर्सिंग के माध्यम से 18 लिपिक, एक योग प्रशिक्षक एवं  नौ चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों कुल 26 कर्मचारियों की नियुक्ति की गई है। इन नियुक्तियों के लिए किसी भी तरह की स्वीकृति नहीं थी।

 

हैरानी ये है कि ये सभी नियुक्तियां मौखिक आदेशों पर की गईं। विभाग के मंत्री के स्टाफ से लेकर रिश्तेदारों तक की नियुक्तियां सामने आ रहीं हैं। हालांकि मंत्री जी का बयान भी अखबार ने प्रकाशित किया है। मंत्री जी कह रहें हैं कि ये मामला वो ‘दिखवाएंगे’। हालांकि मंत्री जी ये भी कह रहें हैं कि ऑडिट रिपोर्ट में बहुत कुछ आता रहता है।

 

ऐसे में जबकि राज्य के बेरोजगार युवा सड़कों पर सरकार से रोजगार की मांग को लेकर सड़कों पर प्रदर्शन कर रहें हैं वहीं सरकार में अपनी पहुंच रखने वालों को मनचाहे पदों पर नियुक्तियां मिल रहीं हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या वाकई में उत्तराखंड में जीरो टालरेंस अंगेस्ट करप्शन है या फिर दिखाने के और खाने के दांत अलग अलग ही हैं।


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