महिला टीचर को पहाड़ भेजने वाले सीएम, विधायकों को गैरसैंण नहीं ले जा सके

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देहरादून। कुछ दिनों पहले एक महिला टीचर और सीएम के बीच हुई बहस यकीनन आपके जेहन में होगी। आपको ये भी याद होगा कि किस तरह सीएम त्रिवेंद्र ने महिला टीचर को सभी के सामने अपमानित करते हुए लहजे में सस्पेंड करने की धमकी दी थी। उस महिला टीचर का कसूर सिर्फ इतना था कि वो एक दशक से अधिक समय से पर्वतीय जिलो में अध्यापन कर रही थी और उम्र अधिक होने के चलते मैदानी जिलों में पोस्टिंग चाहती थी। मुख्यमंत्री उसे देहरादून में पोस्टिंग नहीं दे पाए।

अब दूसरा मसला सुनिए। विधानसभा का शीतकालीन सत्र होना है। चर्चा थी कि गैरसैंण में सत्र का आयोजन होगा। विधानसभा अध्यक्ष ने तो मीडिया के कैमरों के सामने सरकार को निर्देश भी दे दिए कि सरकार गैरसैंण में सत्र कराए लेकिन सरकार है कि जाने को तैयार नहीं है। क्यों? क्योंकि सरकार को ठंड लगती है। जी, ये बयान खुद सीएम त्रिवेंद्र रावत का है। त्रिवेंद्र रावत से जब गैरसैंण में सत्र कराने के मसले पर मीडिया कर्मियों से सवाल पूछा तो उन्होंने कहा कि कई विधायक बुुजुर्ग हैं, गैरसैंण में ठंड अधिक होती है लिहाजा विधानसभा सत्र कराने में दिक्कत हो सकती है।

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सीएम त्रिवेंद्र का ये बयान बताता है कि हमारे जनप्रतिनिधि किस तरह सुविधा भोगी हो चले हैं। उन्हें गैरसैंण जाने में ठंड लग रही है। ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि क्या फिर गैरसैंण में राजधानी बनने की उम्मीद को खत्म समझा जाए। फिर क्या होगा उन लाखों कार्मिकों का, उन लाखों नागरिकों का जो गैरसैंण जैसे पर्वतीय इलाकों में दुरुह स्थितियों में अपने फर्ज को अंजाम देते हैं। सरकार और विधायक हफ्ते, दो हफ्ते के लिए गैरसैंण जाने से घबरा रहें हैं और इस राज्य के लाखों कार्मिक पूरे साल विपरीत परिस्थितों में ऐसी जगहों पर डटे रहते हैं।

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फिर लौटिए तो याद कीजिए उस महिला टीचर के जरिए इस राज्य के हजारों लाखों लोगों को जो सरकार से जरा सी सुविधा की मांग करते हैं और वो भी अपना फर्ज निभाने के लिए उन्हें सरकार दुत्कार के भगा देती है। यही सच है इस राज्य का। जिन्हें इस पर्वतीय राज्य की जनता ने चुना उन्हीं जनप्रतिनिधियों को पहाडो़ं में जाने में ठंड लगने लगी है। वैसे आपको याद रखना चाहिए कि सीएम त्रिवेंद्र की पत्नी शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं और पिछले दो दशकों से देहरादून में ही तैनात हैं। फिलहाल आप ये बयान सुनिए –




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